Wednesday, June 25, 2008

दुनिया के बाज़ार का दस्तूर है ये,
जो खुद बिका वो खरीदार कैसा,
यहाँ तो पल पल बिकती है किसी की आरजू किसी की मुहब्बत,
अपनी चाहत को तराजू पर तौला,
यहाँ सपनों का मोल कैसा...?

3 comments:

swati said...

hmm.. an artificial World!! every body contributes their own share ..

punya said...

well...thats wht v hv made out of it...Once upon a tym..it must hv been a grt place..to FEEL IN... to LIVE IN

worldthrumyeyes said...

बहुत खूबसूरत!